Saturday, March 9, 2013

वसंत

मैं रोकता रहा वसंत को
बच निकला फरफराती हवाओं से
अनदेखी करता रहा
फुनगियों की दस्तक को
अनसुनी कर गया चहचहाहट
ढूँढता रहा बंद कमरे में
वासंती आनंद
और,
एक और,
निराला वसंत निकल गया

ठिठक गई कोपलें
विस्फारित आसमान
हवाओं को मिला
खुला मैदान
जी भर दौडने का  आह्वान
धूल चाट रही थी पत्तियाँ
नाचने लगी, बेजान!
वसंत!
तुम   आये बन कर
कंजूस के घर मेहमान !  

Tuesday, February 26, 2013

Spring

वसंत में
होठ
सूखे पत्तो की तरह 
खडखडाते   हैं, जैसे
टूटन का दर्द लिए 
उतरी हुई मुस्कान! 

Monday, February 11, 2013

Rituraaj

वसंत आया
हर शाख लदी
टेसू फूली
फूला उपवन
फूलों की क्यारी में
अंकुर फूटे
अमराई बौराई
कोयल स्वर गूंजे
धरती की थाल सजी
संध्या के दीप जले
पवन चली मद मस्त
मार्ग सब सुथरे सुथरे
पर मेरे कमरे के उस कोने में
गुलदस्ते के फूल
भले
ऋतुएँ बदली
मौसम बदले
चुप मौन धरे
स्थित प्रज्ञ   योगी
मेरे कमरे के फूल!
"पलाश फूले
पवन झकोरे
सुवास फ़ैली....."

Sunday, January 13, 2013

Some Thoughts

·         विवशताएँ असुविधाओं पर हावी रहती हैं.

·         विश्वास सदैव स्वतंत्रता की बलि ले लेता है

·         चिकने घड़े पर पानी टिकना भी नहीं चाहिए!

·         तुम शब्दों के उच्चारण में डूबे हो, और मैं शब्दों के अर्थों में, भला मेरी बात तुम्हें कैसे समझ आएगी ?

·         तुम्हे पैसा प्यारा है और मुझे मनुष्य की अच्छाइयां - हमारी तो रस्साकशी भी नहीं हो सकती!

·         जो राहों पर ही नहीं चलते उनकी राह देखना व्यर्थ है. 
·         हम अपनी दिशाएं कब खोजेंगे

·         काश हम पेट की भूख मिटाने की तरह दिमाग की भूख मिटाने के लिए तत्पर रहते!

Friday, December 28, 2012

It is Dark....we are living in dark...

आओ हम अपनी इच्छाओं का जुलूस निकालते हैं. फटे हुए वस्त्रों से झांकते हुए तन - दो जून की रोटी के पा लेने के आश्वासन में शरीक ये 'उजालाकरने वाले शरीर, जलसे की  खुशियों में सम्मिलित रहते हुए भी निस्पृह  लोगकुतूहल से निहारते,  जश्न मनाते हुए लोगों का हुजूम,  बैंड की गला फाड़ धुनबाजों पर  इनाम की लालसा में बज रही यंत्रवत ताल. डीजे  की कान-फोड़ आवाज,   गरीबी को ढंकती हुई भड़कीली पोशाखों में, ढंका छुपा मन, बेमन ही सही,  कितनी सुरीली तानें छेड़ रहा हैकूल्हे मटकाते बेताल, बेतहाशा नाचते हुए परिजन, अपने करतब दिखाने की होड़ में लगे दोस्त,  अत्यंत प्रभावशाली दिखने का प्रयत्न? और पूरे समारोह को स्मृतियों   की जुगाली में परिवर्तित करने का जतन करते  फोटोग्राफर! नए नए स्वांग बनाए,  लिपीपुती,  केमरा कांशस,   जबरन मुस्कान   चिपकाए महिलाएं ! उस जुलूस में शरीक जर्जरित मन को झूठी   खुशियों से ढँक कर सम्मिलित जनसमूह है क्या फर्क! इन में मे मुझ और  ?
हम सब एक ही औपचारिकता में लिप्त  हैं.