Wednesday, May 9, 2012

Breeze

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घुलती हुई, छेड़खानी करती हवा-वातास! हवा केवल हवा नहीं, संचय है  पूरे वर्ष का जो अब बह निकला है. सुराखों में घुस गई परेशान  हवा. इसकी सिसकियाँ कौन सुने? हवा  तेरा उद्गम कहाँ हैपेड़ों से निकली   या पेड़ों में से निकली? हवाओं का भी कोई भविष्य है? कभी इस गलियारे कभी उस गलियारे. और गलियारे की भी कोई जगह है? कभी इस आँगन कभी उस आँगन! आँगनो का ही क्या....कभी इस घर में तो कभी उस घर में ....और घर भी क्या घर है जिसमे दरवाजे न हों और वे दरवाजे   आँगन में खुलते हों!
दरवाजे आने के लिए होते हैं या जाने के लिए?
हवाओं की शहनाई . झुरझुरी थरथराई, आगाह कर गई

Sunday, April 22, 2012

हवाएं

·         विचार हवा का एक झोंका है जो मन के परदे को ऊपर उठाता हुआ मस्तिष्क में भर जाता है.

·         हवाएं   ऐसी चलती हैं कि कुछ कह जाती हैं, कहती हुई हवाएं   कभी कभी क्यों बहती है?

·         हवाओं का कारखाना खुल गया है, आहटो का राग बजने लगा है. आओ खुशियों को हवा का परिवेश पहना कर  इसे धकेल दें  और उड़ा ले जाने दें वे नकाब जिन्हें हम 'हम' समझते हैं.

·         छुरी सी तेज हवा को, कन्धों को छीलती हवा को लेकर, इस चिलचिलाती धूप में, मन न जाने कहाँ जाकर छाया में बैठ गया है -घने वृक्षों में, गाडी-डगरों में जाकर छिप गया है गहन शान्ति  में .....
·         कभी हवाएं वासंती हुआ करती थी, कभी सुरभित, कभी आर्द्र और कभी तीखी गरमाई हवा...परन्तु अब एक ही तरह की हवा चारों ओर बह रही है
        - केवल दलदली राजनीतिक    हवा

Wednesday, May 4, 2011

The problem of paternalistic organization is that it assumes that you can not teach your father how   to develop child!

Sunday, May 1, 2011

पक्षी तुम स्वतंत्र हो  
पक्षी तुम स्वच्छंद हो
हम मानते हैं कि तुम स्वच्छंद हो
उन्मुक्त हो कर फैलना चाहते हो - निस्सीम?
फैलाव स्वयं एक सीमा है. परन्तु तुम्हे उन्मुक्त समझते   हैं.
ये सीमाएं फैलाव की हम तुम्हे प्रदान करते हैं.
हम तुम्हें एक खिड़की भर आकाश उपलब्ध नहीं करा सकते
लो! पिंजरा हमने खोल दिया है
..... तो यह डोर क्यों?”
यह डोर नहीं! तुम्हारी अपनी क्षमता है -
यह डोर नहीं, आभार है, प्रतीक है, कर्त्तव्य है
आखिर पिंजरे का भी अधिकार है तुम पर!
पिंजरा अनुभूतियों का है
यह लगाव है तुम्हारा- अतीत के प्रति
विश्वास करो - तुम्हारी उड़ान डोर से अधिक लम्बी नहीं है
तुम्हारे पंख जाने पहचाने हैं - हमने अपने हाथों से ही तो इन्हें बनाया था!   
हम भला तुम्हे  क्यों बांधेंगे? तुम्हारा मोह ही उत्तरदायी है.
पिंजरा तुम्हारी पीड़ा समझता है - इसलिए  द्वार खुले रखे हैं.
हम सलाखे हैं - जड़ हैं, निर्बोध हैं, निरपेक्ष हैं
डोर तुम्हारी भाषा समझती है
तुम बंधे ही रहो इसीमें मंगल है, यही स्वच्छंदता है
यह पराजय नहीं. पराजय तो परों की बुनावट है 
जिसे हमने परिश्रम पूर्वक बुना है.
हम सब तुम्हारे सुख के भागीदार हैं
तुम्हारी उड़ानों के साक्षी हैं
तुम्हे इस अनबूझ स्वतन्त्रता पर बधाई देने आये हैं
डोर, पिंजरा और हाथ हम ही हैं
हम तुम्हारी सुरक्षा, शान्ति और सुख की कामना करते हैं.
हमारा अस्तित्व मात्र तुम्हारी स्वतन्त्रता का द्योतक है
हम जानते हैं कि तुम हमें कभी नहीं भूलोगे
तुम्हारी उड़ानों में हमारी समीकरण खो चुकी है
"समाधान चाहिए?"
यह कैसी आवाज है? किसकी आवाज है?
उन्मुक्तता की? बन्धनों की? संबंधों   की?
आओ हल खोजें
हल - महज एक उड़ान है परिचित ओरछोर  की!

Friday, April 29, 2011

SOME RULES AND BELIEFS OF A COMPANY RUN BY FAUZI MANAGER
       You will only say ‘yes’
       Pay respect otherwise you will be pulled.
       Thinking is not permitted.
       Once told, action has to be taken
       Defense does not have cost-benefit approach.
       Only commander will ask
       Stand in one line.
       Act in split second.
       Shoot if you are in doubt.
       Seek   maximum opportunities to have drinks.
       Fear makes thing moving.
       Rehearse same thing everyday –to keep fit.
       Defend at any cost. It is the question of life and death.
       You can not make mistakes, you are always right!
       Plunge yourself in to the job without bothering consequences.
       Orders are orders. No duplicate required.
       Have more people on your side, it will turn success on your side.
       Take factory rounds just like motor winding- more the turns, more energy produced.

Thursday, April 28, 2011

कुछ चिनगारियाँ यहाँ छोड़ जाता हूँ
या तो वे धधकने लगेगीं
या फिर बुझ जाएगीं 
धधकती ज्वाला तो सब कुछ पवित्र कर  देती है 
बुझी हुई चिंगारी करती है तुम्हारी प्रतीक्षा 
फिर जल उठने के लिए...