राष्ट्रपति प्रसन्न है, अशोक चक्र प्रदान कर रहे हैं एक शूरवीर की असमय विधवा को ..जिसके चेहर पर वेदना है पीड़ा है जो उसने झेली है.. उसने झेली थी. जो नहीं रहा- उसे उस मर्मान्तक दृश्य की बार बार याद दिलाई जाती है, कम से कम पंद्रह बार पूर्वाभ्यास भी करना पडा होगा .. बेचारी ... गर्व का दिन पीडाओं को और गहरी कर गया Saturday, May 3, 2014
Jay Ho!
खोखली वाणी में 'जय हिंद' गूँज रहा है मन अभावों में अटका हुआ है, सरकार हमारे पैसे खर्च कर उसकी उपलब्धि गिना रही है जनता उनकी 'जय' के नारे लगा रही ..शायद कुछ दिन का भोजन मिल जायगा . रेगिस्तान में भी कायदे होते है जीने के लिए ..'जय' बुलवाने के त्यौहार का दिन है Thursday, March 6, 2014
Sun
प्रकृति बादलों के सफ़ेद आँचल से सहला रही है नर्म आँच फिर अच्छी लगाने लगी है
जो कुछ रुका हुआ था, जम सा गया था पिघल रहा है बह निकला है, जड़ता चैतन्य में परिवर्तित हो रही है. धूप अच्छी लगने लगी है
कितनी कविताएं बह निकली होगीं इस अश्रु धारा के साथ साथ ...
Monday, February 3, 2014
Vasant -14
सुना
है वसन्त आ गया है
मै ढूँढने निकल पडा, कही दिखाई नहीं दिया. शायद ऋतुराज होने के नाते साधारण लोगो से नहीं मिलता होगा! यह एक रिवाज होगा या कोई मजबूरी होगी - साधारण मनुष्य भी कितना साधारण कर दिया गया है...
वासंती हवाओं की तलाश में निकला था ---हवाइयां मिली चेहेरों पर! हरी हरी दूब से पटे हुए बड़े बड़े लान उस पर दौड़ते हुए रंग बिरंगे परिधानों में लिपटे शरीर, क्यारियों में तरतीब से उगाये हुए फूल, वसंत को करीने से प्रदर्शन के लिए लाया गया है. पोस्टरों में वसंत उमड़ रहा है. आखिर वसंत को भी मनाना पड़ता है, मनाना चाहिए- ऊपर से आर्डर है.
फूल कुछ कहते हुए से क्यों नहीं लगते? पेड़ आमंत्रण क्यों नहीं देते? दूब दुलारती क्यों नहीं? वे रस भरी हवाएं कहाँ गयीं? वे हवाएं जो टेसुओ के इर्द गिर्द भागती फिरती है, मादक रस से भरे फूलों पर मंडराते हुए भंवरों के पंखो से चलती हैं, क्यों नहीं हैं यहाँ?
Sunday, February 2, 2014
Tuesday, December 31, 2013
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