बादलो की देहरी पर खडी होकर, बादलों की फटन के झरोखों से नभ सुंदरियां स्वर्ग से झाँख कर अपनी सांवली छटा दिखला रही हैं. बादल धरा पर पाँव टिकाते टिकाते चल रहे हैं.
Wednesday, June 26, 2013
Sunday, June 9, 2013
Sunday, May 26, 2013
Sunday, May 5, 2013
Saturday, May 4, 2013
Saturday, March 9, 2013
वसंत
मैं रोकता रहा वसंत को
बच निकला फरफराती हवाओं से
अनदेखी करता रहा
फुनगियों की दस्तक को
अनसुनी कर गया चहचहाहट
ढूँढता रहा बंद कमरे में
वासंती आनंद
और,
एक और,
निराला वसंत निकल गया
ठिठक गई कोपलें
विस्फारित आसमान
हवाओं को मिला
खुला मैदान
जी भर दौडने का आह्वान
धूल चाट रही थी पत्तियाँ
नाचने लगी, बेजान!
वसंत!
तुम आये बन कर
कंजूस के घर मेहमान !
Wednesday, March 6, 2013
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