Wednesday, January 30, 2013
Sunday, January 13, 2013
Some Thoughts
· विवशताएँ असुविधाओं पर हावी रहती हैं.
· विश्वास सदैव स्वतंत्रता की बलि ले लेता है
· चिकने घड़े पर पानी टिकना भी नहीं चाहिए!
· तुम शब्दों के उच्चारण में डूबे हो, और मैं शब्दों के अर्थों में, भला मेरी बात तुम्हें कैसे समझ आएगी ?
· तुम्हे पैसा प्यारा है और मुझे मनुष्य की अच्छाइयां - हमारी तो रस्साकशी भी नहीं हो सकती!
· जो राहों पर ही नहीं चलते उनकी राह देखना व्यर्थ है.
· हम अपनी दिशाएं कब खोजेंगे?
· काश हम पेट की भूख मिटाने की तरह दिमाग की भूख मिटाने के लिए तत्पर रहते!
Friday, December 28, 2012
It is Dark....we are living in dark...
आओ हम अपनी इच्छाओं का जुलूस निकालते हैं. फटे हुए वस्त्रों से झांकते हुए तन - दो जून की रोटी के पा लेने के आश्वासन में शरीक ये 'उजाला' करने वाले शरीर, जलसे की खुशियों में सम्मिलित रहते हुए भी निस्पृह लोग, कुतूहल से निहारते, जश्न मनाते हुए लोगों का हुजूम, बैंड की गला फाड़ धुन, बाजों पर इनाम की लालसा में बज रही यंत्रवत ताल. डीजे की कान-फोड़ आवाज, गरीबी को ढंकती हुई भड़कीली पोशाखों में, ढंका छुपा मन, बेमन ही सही, कितनी सुरीली तानें छेड़ रहा है, कूल्हे मटकाते बेताल, बेतहाशा नाचते हुए परिजन, अपने करतब दिखाने की होड़ में लगे दोस्त, अत्यंत प्रभावशाली दिखने का प्रयत्न? और पूरे समारोह को स्मृतियों की जुगाली में परिवर्तित करने का जतन करते फोटोग्राफर! नए नए स्वांग बनाए, लिपीपुती, केमरा कांशस, जबरन मुस्कान चिपकाए महिलाएं ! उस जुलूस में शरीक जर्जरित मन को झूठी खुशियों से ढँक कर सम्मिलित जनसमूह है क्या फर्क! इन में मे मुझ और ?
हम सब एक ही औपचारिकता में लिप्त हैं.
Wednesday, December 12, 2012
Wednesday, September 26, 2012
Thursday, September 20, 2012
Monday, September 10, 2012
पचमढ़ी में कभी
घाटियों में भटके हुए शिशु बादल .....बादल झुण्ड, दल के पीछे न छूट जाएं इसलिए त्वरित गति से अनुसरण करते हुए नन्हे बादलगण.
न जाने किस आनंद में बहता झरना ..आतुर झरना, कल्लोल करती धाराएं और दुबका हुआ रूप बदलता बहुरूपिया निर्झर ...चोरी कर भागता हुआ नटखट झरना.
सांवली धरा पर बादलों की छाया और नाले को फिसलपट्टी बना कर रपटते हुए आसमान, पानी के कण कण को आसमान बना कर चमका रहा झरना.
जैसे सांवले शरीर पर चांदी के आभूषण पहने कोई सुन्दरी इठला रही है
धरती का कोई टुकड़ा मानो ऊपर उठ गया हो या पृथ्वी पर आकाश की कृपा उतर रही हो, कहीं दूर हरियाली, धूप में चमक कर निराली छटा पैदा कर रही है. मानो ईश्वर ने यही टुकड़ा चुन कर जीवंत कर दिया हो! अभिव्यक्ति की सीमा तक पहुँच गया कोई बादल!
धूप और बादल, उफनते हुए बादल आकारों से खेलते हुए बदलते हुए बादल - रूई की तरह धुनें हुए बादल --एथलीट बादल!
धुंध बन कर चारों ओर से स्मृतियों की तरह घेरते हुए बादलों की छाया ... हरी हरी, समतल धरा पर बिछे हुए कालीन बादल
आज मेरे कमरे कमरे का रोम रोम टपक रहा है किसी तरह अपनी सुरक्षा किये हुए बैठा हूँ. मन में घुप अन्धेरा छाया हुआ है.बाहर, बादल के नर्म नर्म ढेर को शहर की रोशनी छू रही है. बिजलियाँ टूट पडी है, लहरें उठ रही हैं और चट्टानों से टकरा टकरा कर टूट रही हैं , बिखर रही हैं. बचा रहता है फेन ..झाग...छोटे छोटे सुख बुलबुलों की तरह फूट जाते हैं. फफोलों के फूटने से तो आराम मिलता है परन्तु इनके फूटने से दुःख का विस्तार ही होता है.
कमरे की छत दो दिन से टपक रही है इससे मुझे लगाव हो गया है, यह मुझे स्वधर्मी लगती है, रह रह कर बरसात होती है ..और कुछ अंश छत पर ही छूट जाता है अब छत आसमान हो गई है. मेरी तरह रीत रही है दिन रात!
पत्तों पर पानी के गिराने की आवाज आ रही है ... ऐसा लगता है कि मैं इसे युगों से सुनता आ रहा हूँ. आदिम युग में भी पत्ते ऐसे ही टपकते होंगे!
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